रामलीला मेला पठकाना में फिर हुआ अचम्भा मंचन


 क्षण भर के लिए दर्शकगण हो गए स्तब्ध और पसर गया सन्नाटा

शाहाबाद। श्री रामलीला मेला मोहल्ला पठकाना में एक बार फिर वही विचित्र मंचन बृन्दावन के कलाकारों ने सफलतापूर्वक कर दिखाया। जिसका कि पहले से राम भक्तों में भय था। परन्तु परम्परा है। इसीलिए निभाना पड़ी और घड़ी 2 घड़ी के लिए दर्शकगण स्तब्ध हो गए। सभा मध्य सन्नाटा पसर गया और कुछ भावुक भक्तों सहित दर्शकों के नेत्र क्षण भर के लिए अश्रुपूरित हो गए। यद्यपि राम को वनवास हो गया है। विधि के विधान को भला कौन टॉल सकता है। परंपरागत रूप से मोहल्ला पठकाना शाहाबाद में रामलीला का मंचन हो रहा है। यहाँ पर कोई मजाक नहीं हो रहा है। जो कोई अपनी मर्जी से यहां किसी भी दृश्य में किसी प्रकार का कोई बदलाव या परम्परा से हटकर कोई क्रियान्वयन कर सके। इसलिए जो सही है वही दृश्य दर्शकों को दिखाए जा रहे हैं। वह भी बृन्दावन की सुप्रसिद्ध पार्टी कलाकारों द्वारा सफल मंचन के माध्यम से लीलाएं खेली जा रही हैं। बताते चलें कि मोहल्ला पठकाना शाहाबाद की रामलीला मेला से जुड़े सभी स्थानीय एवं बाहरी पात्र पूर्णतः प्राचीन परम्पराओं से बंधे हैं। यहाँ पर किसी की अपनी मनमर्जी का किंचित मात्र महत्व नहीं है। अनुशासन इस मेले की विशेषता है। इसलिए वही दृश्य यहाँ द्रष्टव्य होते हैं जो पूर्णतया पारम्परिक हैं। तो चलिए जानते है कि फिर क्या खेला गया बृन्दावन पार्टी के कुशल कलाकारों द्वारा जो कि दर्शकों की आत्मा पर्याप्त शुद्ध कर दिया और संस्कारों को अत्यंत बल मिला। वास्तव में पठकाना रामलीला में बड़ा जोरदार मन्थरा- कैकेयी सम्वाद हुआ। दोनों के संवाद का सार जानकर एकएक रामलीला मैदान का धरातल ही नहीं बल्कि जमीन आसमान कांप उठा। वातावरण व्याकुल होने लगा। जब राजा दशरथ द्वारा राम को राजा बनाने की घोषणा के बाद ही मन्थरा मन ही मन भड़क गई और उसने ही कैकेयी को भड़का कर राम राज्याभिषेक में विघ्न डाल दिया। मंथरा ने कैकेयी को भड़काना शुरू करते हुए कहा, ’रानी आप यह मत भूलिए राम अगर अयोध्या के राजसिंहासन के अधिकारी बने तो भरत राज परम्परा से अलग हो जाएंगे’ अपने बेटे के भविष्य को अंधकार में देखते हुए रानी कैकेयी ने मंथरा से सलाह ली कि उन्हें क्या करना चाहिए तब मंथरा ने उन्हें राजा से अपने दो वचनों की बात का स्मरण कराते हुए राजा दसरथ से उन वचनों में राम के वनवास और भरत के लिए राजसिंहासन मांग लेनी की सलाह दी। तभी कैकेयी ने मंथरा की बात मानकर बिलकुल वैसा ही किया। जैसा दासी मंथरा ने कहा और रघुवर कुल की परम्परा के हिसाब से राजा दशरथ को अपने वचनों का पालन करना पड़ा। परिणामस्वरूप राम को वनवास और भरत को राजसिंहासन देने का वचन निभाना पड़ा। किवंदंतियों के अनुसार मंथरा एक गंधर्व कन्या यानी की अप्सरा थी। जो कि इन्द्र के दबाव में कैकेयी की दासी बनी और उसने ही राम को वनवास देने की शाजिस रची।

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राम वनवास से बचनबद्ध और रघुकुल परम्परा से प्रेरित एवं पित्र भक्ति के वशीभूत राम वनगमन के समय सभी दर्शक दुखी हो गए। जैसे ही राजा दशरथ को यह समाचार मिला कि राम लक्ष्मण सीता सहित वनगमन कर गए कि उनके मन मस्तिष्क को तेज झटका लगा और उनके प्राण पखेरू उड़ गए। राम वनगमन का समाचार तथा दशरथ के गोलोकवासी होने की सूचना मिलते ही सम्पूर्ण अवध शोकाकुल हो गया और सम्पूर्ण विश्व में अयोध्या की चर्चा होने लगी। इस अवसर पर रामलीला मेला महामंत्री अनुराग मिश्रा, मंत्री आशीष मोहन तिवारी, ऋषि कुमार मिश्रा, शशि मिश्रा, पुष्पेंद्र मिश्रा, मृदुल अवस्थी श्याम, अभय खत्री, वंसत गुप्ता, अनमोल गुप्ता आदि उपस्थित रहे।


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