ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में राहुल , वैष्णो माता के दर्शन के बाद खुद को बताया कश्मीरी पंडित


 माता वैष्णो देवी के दर्शन के बाद राहुल गांधी ने आज जम्मू में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। इस दौरान वह पूरे हिंदुत्व रंग में रंगे नजर आए। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करने के दौरान जय माता दी के नारे लगवाए। इसी दौरान उन्होंने कश्मीर से अपना नाता जोड़ते हुए कहा कि वह और उनका परिवार भी कश्मीरी पंडित है। इससे पहले भी ऐसे कई मौके आए हैं जब कांग्रेस ने या फिर राहुल गांधी ने खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण या दत्तात्रेय गोत्र वाले ब्राह्मण या कश्मीरी पंडित के तौर पर पेश किया है। लेकिन आज एक बार फिर से राहुल गांधी द्वारा कश्मीरी पंडित वाला राग छेड़ी जाने का राजनीतिक संदेश कुछ और जाता दिखाई दे रहा है।

राहुल ने कहा कि जब भी वह जम्मू आते हैं तो उन्हें अपने घर जैसा महसूस होता है। उन्होंने आगे कहा कि मैं और मेरा परिवार भी कश्मीरी पंडित है और हम झूठ नहीं बोलते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मैं अपने कश्मीरी भाई और बहनों की समस्या सुलझाउंगा। मेरे परिवार का जम्मू कश्मीर से लंबा रिश्ता है। मैं जब भी कुछ बोलता हूँ, तो वो मैं नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता बोलता है। आज जब मैं कुछ कश्मीरी पंडितों से मिला तो उन्होंने कहा कि भाजपा ने उन्हें मुआवजा देने का वादा किया था लेकिन उन्हें किसी भी तरह का कोई मुआवजा नहीं दिया गया। 

राहुल का एक बार फिर से ब्राह्मण राज उत्तर प्रदेश चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव है। प्रदेश में ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा है। ऐसे में उनका मजबूत वोट बैंक भी है। इस लिहाज से माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का वोट जिस पार्टी को गया सत्ता उसकी आने की संभावना ज्यादा रहती है। वर्तमान में देखें तो योगी सरकार पर विपक्ष लगातार ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगा रहा है तो वहीं मायावती ब्राह्मणों को साधने के लिए 'प्रबुद्ध वर्ग'वसम्मेलन कर रही हैं। 2017 के चुनाव में भाजपा को ब्राह्मणों का खूब समर्थन मिला था, वहीं 2007 में हमने देखा कि किस तरह से मायावती को ब्राह्मणों का समर्थन हासिल हुआ था जिसके बाद दोनों ही दलों कि सरकार प्रदेश में बनी थी। फिलहाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सियासी वनवास काट रही है। उसे महासचिव और गांधी परिवार की बेटी प्रियंका गांधी से बहुत ही उम्मीद है।

एक वक्त था जब उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था। लेकिन अब वक्त बदल गया है। दिलचस्प बात है कि उत्तर प्रदेश के आखरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री जो आखरी ब्राह्मण मुख्यमंत्री भी थे नारायण दत्त तिवारी थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने मास्टर कार्ड खेलते हुए शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश में आगे किया था जो कि ब्राह्मण थीं। इस बार के भी चुनाव में खुद से छिटक चुके ब्राह्मणों को साधने की कोशिश कांग्रेस लगातार कर रही है।

ब्राह्मण क्यों अहम

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब 10 फ़ीसदी के आसपास है। कई ऐसे महत्वपूर्ण सीट हैं जहां ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में होते हैं। शुरुआत के समय में नजर डालें तो ब्राह्मणों का वोट कांग्रेस को ही जाता था लेकिन 80 और 90 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति के बीच कांग्रेस से उसका यह ठोस बैंक छिटकता चला गया। इसका एक महत्वपूर्ण कारण राम मंदिर आंदोलन भी था। राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा को ब्राह्मणों का वोट मिलना शुरू हुआ। हालांकि 2000 के करीब भाजपा कमजोर हुई तो इसका फायदा मायावती को मिला और 2007 के विधानसभा चुनाव में ब्राम्हण पूरी तरह से मायावती के साथ चले गए।

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