उत्तराखंड ,सैलाब चीन बॉर्डर पर पहुंचाने वाला एकमात्र पुल भी बहा ले गया

 


हादसे वाली जगह करीब दो हजार लोग रहते हैं; पास के गांवों में ज्यादा पानी नहीं गया, नहीं तो हादसा भयावह होता

देवभूमि उत्तराखंड में करीब साढ़े सात साल बाद फिर से कुदरती कहर दिखा। हम आपको हादसे की जगह यानी चमोली के रैणी गांव से ग्राउंड रिपोर्ट दे रहे हैं। यह वही जगह है, जहां ग्लेशियर टूटने से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। गवर्नमेंट पीजी कॉलेज कर्णप्रयाग के डॉ. वीपी भट्ट और गोपेश्वर गवर्नमेंट पीजी कॉलेज के डॉ. अखिलेश कुकरेती ने भास्कर के लिए ये रिपोर्ट दी है...

‘मैं डॉ. वीपी भट्‌ट कर्णप्रयाग के गवर्नमेंट पीजी कॉलेज में प्रोफेसर हूं। आज आपको अपने साथी डॉ. अखिलेश कुकरेती के साथ चमोली में ग्लेशियर टूटने की पूरी घटना का आंखो देखा हाल बता रहा हूं। इस दर्दनाक हादसे की चीखें हमारे कानों में अब भी बसी हुई हैं। हमने इस हादसे में अपने प्रिय स्टूडेंट के परिवार के सदस्य को भी खो दिया है। चमोली जिले की कुल आबादी 3.90 लाख है। हरा-भरा और पहाड़ों का खूबसूरत नजारा इसकी पहचान है। लेकिन आज की आपदा ने हम सबको झकझोर दिया है।

ये आपदा सुबह के करीब दस बजे आई। तपोवन के रैणी गांव के पास सप्तऋषि और चंबा पहाड़ है। इन दोनों पहाड़ों के बीच के सबसे निचले हिस्से से ग्लेशियर टूटकर ऋषिगंगा नदी में गिर गया। इससे नदी का पानी उफान पर आ गया। देखते ही देखते नदी के पास का मुरिंडा जंगल इसकी चपेट में आकर साफ हो गया। करीब 15 से 20 हेक्टेयर जंगल को नुकसान हुआ। ये वही जंगल है जहां से 1970 में गौरा देवी ने चिपको मूवमेंट शुरू किया था।

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